dark side of money
अंधेरा जब सिर्फ बाहर नहीं, अंदर भी उतर आता है—तब इंसान असली कहानी बन जाता है। “अंदर का अंधेरा” शहर की भीड़ में चलते हुए आरव हमेशा अकेला महसूस करता था। लोग हँसते थे, बातें करते थे, लेकिन उसके अंदर एक खामोशी थी—गहरी, ठंडी और डरावनी। उसकी ज़िंदगी में सब कुछ ठीक दिखता था—अच्छी नौकरी, ठीक-ठाक दोस्त, और एक सामान्य दिनचर्या। लेकिन हर रात, जब वो अपने कमरे की लाइट बंद करता, एक अजीब सा अंधेरा उसे घेर लेता। ये अंधेरा सिर्फ रोशनी की कमी नहीं था। ये उसके अधूरे सपनों का था। उसकी गलतियों का था। उन बातों का था, जो उसने कभी किसी से कही ही नहीं। एक रात, उसने खुद से पूछा— "मैं किससे भाग रहा हूँ?" कोई जवाब नहीं आया। अगले दिन, उसने वही किया जो वो हमेशा टालता था—अपने आप से बात करना। उसने अपने डर को लिखा। अपनी नाकामियों को स्वीकार किया। और पहली बार, अपने आँसुओं को छुपाया नहीं। धीरे-धीरे उसे समझ आया— अंधेरा दुश्मन नहीं था। वो एक आईना था, जो उसे उसकी सच्चाई दिखा रहा था। कुछ महीनों बाद, आरव वही इंसान था—पर अब वो भागता नहीं था। अंधेरा आता था, लेकिन अब वो उससे डरता नहीं था। वो उसे समझता था। कहानी का सच ...